अर्नब की गि'- रफ्तारी पर बोले रवीश कुमार- अर्नब पत्रकार नहीं बल्कि भीड़ को उ'- कसाने वाला है..

अन्वय नाइक और कुमुद नाइक उ'- कसाने का मामला सं'- गीन है लेकिन सिर्फ नाम भर आ जाना काफी नहीं होता है। नाम आया है तो उसकी जांच होनी चाहिए और तय प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। एक पुराने केस में इस तरह से गि'- रफ्तारी संदेह पैदा करती है। महाराष्ट्र पुलिस को कोर्ट में या पब्लिक में स्पष्ट करना चाहिए कि क्या प्रमाण होने के बाद भी इस केस को बंद किया गया था? क्या रा'- जनीतिक दबाव था? तब हम जान सकेंगे कि इस बार दबाव में ही सही, किसी के साथ इं'- साफ़ हो रहा है। अदालतों के कई आदेश हैं।

उ'- कसाने के ऐसे मामलों में इस तरह से गि'- रफ्तारी नहीं होती है। का'- नून के जानकारों ने भी यह बात कही है। इसलिए महाराष्ट्र पुलिस पर संदेह के कई ठोस कारण बनते हैं। जिस कारण से पुलिस की का'- र्रवाई को महज़ न्याय दिलाने की का'- र्रवाई नहीं मानी जा सकती। भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फां'- सी डालने जैसा है। झूठे मामले में फं'- साने से लेकर लॉक अप में किसी को मा'- र देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता व'- सूल लेने और किसी को भी ब'- र्बाद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है।

जांच और काम में इसका नाम कम ही आता है। इसलिए किसी भी राज्य की पुलिस हो उसकी हर क'- रतूत को संंदेह के साथ देखा जाना चाहिए। ताकि भारत की पुलिस ऐसे दु'- र्गुणों से मुक्त हो सके और वह रा'- जनीतिक दबाव या अन्य लालच के दबाव में किसी निर्दोष को आ'- तंकवाद से लेकर दं'- गों के आरोप में न फंसाए। अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस ब'- दले की भावना से कार्रवाई कर रही है। ग़लत नहीं कहा जा रहा है। क्या दिल्ली पलिस और यूपी की पुलिस ब'- दले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में हमारी तरह ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। मुझे कुछ होगा तो अर्णब गोस्वामी एक लाइन नहीं बोलेंगे।

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