जस्टिस काटजू का बड़ा बयान - मोदी सरकार के एक फैसले से नौ साल पीछे चला गया कश्‍मीर

पांच अगस्त, 2019 के दिन जम्मू कश्मीर के लोग जब अपनी नींद से जागे, तब उन्हें शायद ही अंदाजा था कि संविधान के अनु’च्छेद 370 को निरस्त किया जा रहा था। वे उठे तो उन्होंने पाया कि उनके सेलफोन काम नहीं कर रहे थे। कोई इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं थी। कोई सेलुलर नेटवर्क काम नहीं कर रहा था और कई तरह की पाबं’दियां लगाई जा चुकी थीं। हर कोई जानकारी पाने के लिए टेलीविजन स्क्रीन के सामने बैठा हुआ था। 

वहां उन्होंने कई कश्मीरी राजनीतिक नेताओं की गि’रफ्तारी और राजनीतिक परिवर्तनों के बारे में सुना। कई क्षेत्रों में क’र्फ्यू लगाया गया था और मीडिया पर गं’भीर प्रति’बंध लगाए गए थे। एक साल होने को है, फिर भी कश्मीर घाटी को अब तक उचित इंटरनेट सेवाओं से वंचित रखा गया है। और भी कई प्रति’बंध जारी हैं।
कई नेता आज भी हि’रासत में या घर में नजरबं’द हैं। यह घोषणा की गई थी कि धारा 370 के उ’न्मूलन से कश्मीर में कई उद्योगों का विकास होगा, लेकिन यह एक केवल ना पूरी होने वाली उम्‍मीद बन कर रह गया है।
व्यवसायी केवल वहीं निवेश करेंगे जहां एक शांतिपूर्ण वातावरण होगा, लेकिन घाटी में स्थिति अभी भी गं’भीर है। आतं’कवा’द की यत्र-तत्र घट’नाएं होती ही रहती हैं। इस आवे’शित वातावरण में शायद ही कोई निवेश करेगा।

सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए लोगों के लिए एक लोकतांत्रिक स्थान होना चाहिए। इसके लिए स्वतंत्र रूप से निर्वाचित विधायिका, बोलने की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। वर्तमान में ये सभी मौजूद नहीं हैं। हालांकि यह क्लैंप’डाउन लगभग एक साल पहले लाया गया था।
यदि यह स्थिति अधिक समय तक बनी रही तो यह अनिवार्य रूप से कश्मीरी युवाओं को आ’तंकवा’द की ओर झु’का सकता है। लोगों को अपनी बात कहने का उचित मौका दिया जाना चाहिए, अन्यथा उनकी ना’रा’ज़गी जल्द या बाद में कभी न कभी हिं’सक रूप में भ’ड़क सकती है।

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